| فلست أراك، كأنـــي يــتيــــم | يقول الصغير:أبي، أين أنت |
| فتـحرمني مـن حنان عظيــم؟ | أتلهيك كل المشـاغـل عـــني |
| فتطعنني وحدتي في الصميم؟ | وأكـبـر حـين تكـون بعـــيدا |
| وحين سقوطي فلا من يقيـم؟ | تضل خطـاي، فلا من يعين |
| وتقـذفني في مهاوي الجحيـم | كأنك تربــح هـذي الحيــاة |
| فتربيتــي هـي درب النعـيــم | أبي ان أردت دروب الهناء |
| وحـين تغـيب، بقـايا هشيــم | أنا في وجودك روح وعقل |
| د. فتحي علي عبدالله | |
| 1/5/1992 |